परिभाषा · Definition
देवताओं के गुरु का पुष्य में आगमन
गुरु-पुष्य योग — भ्रमित न करें गुरु पुष्य योग (गुरुवार-चंद्रमा-पुष्य) से — तब होता है जब बृहस्पति ग्रह स्वयं पुष्य नक्षत्र (3°20\' – 16°40\' कर्क, नाक्षत्रिक) से गुजरता है। यह आकाश में बृहस्पति की वास्तविक उपस्थिति है उसी नक्षत्र में जिसका देवता वह है।
पुराणिक परम्परा में बृहस्पति देवगुरु हैं — आचार्य जो धर्म, ज्ञान और समृद्धि का शासन करते हैं। जब वे अपने ही नक्षत्र — पुष्य ("पोषणकर्ता") — में होते हैं, तो उनके सभी गुण ब्रह्माण्डीय स्तर पर प्रवर्धित होते हैं।
शास्त्रीय स्रोत
सर्वोच्च कार्य
ऐतिहासिक चक्र
गुरु-पुष्य योग के 12-वर्षीय चक्र
| प्रवेश | निकास | अनुमानित अवधि | स्थिति |
|---|---|---|---|
| अगस्त 1989 | जुलाई 1990 | ~11 माह | पूर्ण |
| जुलाई 2001 | जून 2002 | ~11 माह | पूर्ण |
| जून 2013 | जुलाई 2014 | ~13 माह | पूर्ण |
| अक्टूबर 2025 | अगस्त 2026 | ~10 माह | वर्तमान चक्र |
| ~सितम्बर 2037 | ~अगस्त 2038 | अनुमानित | भविष्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शास्त्रीय प्रश्नोत्तर
पुष्ये गुरौ सर्वसिद्धिः
गुरु के पुष्य में होने पर सब सिद्ध होता है
गुरु-पुष्य योग ज्योतिष का सबसे दुर्लभ वरदान है। जब देवगुरु बृहस्पति पुष्य — अपने ही नक्षत्र — में लौटते हैं, तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विद्या, धर्म और ज्ञान के लिए झुक जाता है। यह 12 वर्षों में एक बार मिलने वाला वह दिव्य क्षण है जब गुरु और शिष्य, ज्ञान और जिज्ञासु, एक ही ब्रह्माण्डीय प्रकाश में मिलते हैं।
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